Start date: January 23, 2018 - End date: February 7, 2018

‘अतिथि देवो भव।’ का प्रत्यक्ष अनुभव कराती है वनयात्रा

वनवासी और नगरवासियों के सामाजिक समरसता का अच्छा उदाहरण है वनवासी कल्याण आश्रम की वनयात्रा का आयोजन।
वनयात्रा के माध्यम से नगरवासी वनक्षेत्र के गाँवों की ओर जाते है और वनवासी बन्धुओं के स्वागत और प्रेम का अनुभव करते है। निच्छल प्रेम क्या है ? – यह तो वे जाने जिन्होंने वनयात्रा में वनवासियों के घर के स्वागत का अनुभव किया हो। ‘अतिथि देवो भव।’ इस उक्ति का यथार्थ अनुभव है वनयात्रा।

वनयात्रा नगरवासियों मंे सामाजिक दायित्व बोध को जागृत करती है और कल्याण आश्रम द्वारा चल रहे कामों का प्रत्यक्ष दर्शन भी कराती है। वनवासी ग्रामीण क्षेत्र में जाने के कारण भारतीय संस्कृति के दर्शन होते है और परम्पराओं, आस्थाओं के बारे में जानकारी भी मिलती है।

किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में वनवासी बन्धु नृत्य प्रस्तुत करते है तो नगरवासी अपने आप रोक नहीं पाते है। वे स्वयं भी नृत्य में सम्मिलित होकर सामाजिक अभिसरण का अनुभव करते है।

वनयात्रा से वापस आने बाद नगरवासी परिवारों को अपने कार्य महत्व ध्यान में आता है और नगरीय काम में भी सही अवधरणाओं को हम प्रवाहित करने मे सपफल हुए है। वैसे वनवासी समाज के प्रति कई भ्रान्तियाँ नगरवासियांे के मन में है – चर्चा अथवा भाषणों से वे दूर नहीं करना बड़ा ही कठीन है परन्तु एक वनयात्रा बिना बताए बहुत कुछ स्पष्ट कर देती है। सही घारणा की अनुभूति भी वनयात्रा की एक फलश्रुति है।

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