संकट के समय सहयोग कर अपना कर्तव्य निभाया

 

‘सभी भारतीय मेरे भाई-बहन है..’, विद्यालय में यह प्रतिज्ञा कई वर्षो तक बोली जाती है बन्धुभाव की अनुभूति भी तो होनी चाहिए वनवासी कल्याण आश्रम के कार्यकर्ताओ ने विद्यालय की प्रतिज्ञा के उपरोक्त अंश का प्रत्यक्ष उदारहण प्रस्तुत किया महाराष्ट्र के मुलशी ब्लाक के असदे गाँव के कतकारी परिवार पर आये संकट के समय साथ में खड़े रहे एक आप्तजन की तरह उन्हें मदद की.

छोटे से असदे गाँव के निवासी शरद वाल्हेकर के घर में 11 अक्टूबर 18 को अचानक आग लगी एक गरीब कातकारी परिवार के झोपड़ी जैसा घर कुछ ही समय में राख बन गया उस समय घर में थोडा बहुत सामान, बर्तन, अनाज, कुछ कपडे और अंदाजित 5700 रू थे परन्तु उसमे से कुछ नही बचा गाँव के लोग इकठठा हुए और आग बुझाने में सहयोग दिया

उसी गाँव के रामचंद्र भरम ने उन्हें भोजन हेतु कुछ अनाज और रात्रि निवास के लिए कम्बल दिए.
पंचायत सदस्य सचिन संठे तथा जिला पंचायत सदस्य सागर काटकर को इसकी जानकारी डी गई उन्होंने इस घटना के संदर्भ में पंचनामा कर शासन की और से उन्हें आर्थिक सहायता मिले उसके लिए प्रयास किये वनवासी कल्याण आश्रम के कार्यकर्ताओं ने असदे गाँव के इस परिवार का तुरंत संपर्क कर प्राथमिक रूप से 15 दिन तक चले उतने अनाज की व्यवस्था की और अपने छात्रावास से जीवन उपयोगी वस्तु देकर एक भाई की तरह कर्तव्य निभाया हम नगरवासी-वनवासी मिलकर वनवासी कल्याण आश्रम का काम करते हैं ‘तू में एक रक्त’ यह घोष वाक्य बोलते हैं, इसकी अनुभूति दोनों को हुई आग के कारणजिनकी झोंपड़ी सम्पूर्ण जल गई ऐसे शरद कोल्हेकर के चहरे पर जो भाव थे वे कह रहे थे कि ‘कल्याण आश्रम मेरा है’.

सोशल मिडिया पर अपने मनो भाव प्रकट करते हुए एक ने कहा, ‘आज जनजाति क्षेत्र में कुछ तत्व ऐसे भी हैं- हमें वनवासी क्यों कहते हो ? हमें आदिवासी कहो जैसे नारे लगते हैं एक प्रकार से राजनीती करते हैं समाज में भ्रम फ़ैलाने का काम कर रहे हैं उन सभी से एक प्रश्न है कि कातकारी समाज के अपने भाई को जब मदद करनी चाहिए, तब आप कहाँ थे? .

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