उच्च शिक्षण संस्थाओं में आरक्षण की 200सूत्रीय पुरानी व्यवस्था बहाल की जाए

देश की केन्द्रीय उच्च शिक्षण संस्थाओं विश्व विद्यालयों एवं उनसे सम्बद्ध महाविद्यालयोंमें शैक्षणिक पदों एवं रिक्तियों में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजातियों को देय संवैधानिक आरक्षण व्यवस्था पर अप्रेल 2017 में इलाहबाद उच्च न्यायालय ने इन समुदायों के हितों पर दूरगामी नकारात्मक प्रभाव डालनेवाला एक निर्णय दिया। इसकी पुष्टि गत वर्ष उच्चतम न्यायालय ने भी कर दी। इस निर्णय के विरूद्ध केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्रालय एवं विश्व विद्यालय अनुदान आयोग ने गत वर्ष के मध्य में विशेष अनुमति याचिकाएं दायर की थी, उन दिनों याचिकाओं को भी गत 22 जनवरी को मा. उच्चतम न्यायालय ने खारीज कर दिया है। इन दोनों वर्गों को यह आरक्षण प्रारम्भिक भरतियों एवं पदोन्नति दोनों में क्रमशः 15 एवं 7.5 प्रतिशत देय है। अन्य पिछड़ा वर्ग ओबिसीको केवल प्रारम्भ की भरतियों में ही 27 प्रतिशत आरक्षण देय है, पदोन्नति में नहीं।

इस निर्णय के अनुसार अब पूर्व कि समूचे संस्थान को एक इकाई मानकर 200 सूत्रीय रोस्टर व्यवस्था के स्थान पर समूचे संस्थान के स्थान पर अलगअलग विभागों को अलगअलग इकाई मानकर 13 सूत्रीय रोस्टर व्यवस्था लागू कि गई है। साथ ही प्रोफेसरएसोसिएटेड प्रोफेसर व सहायक प्राफेसर इन तीन श्रेणियों को भी अलग इकाई माना जाएगा। सरल शब्दों में कहा जाए तो 13 पद रिक्त हो तो जहाँ चैथी भरती पर 1 ओबिसी 7वी भरती पर 1 एस.सी. को लिया जाएगा। एस.टी. को आरक्षण में एक भी स्थान नहीं मिलेगा, उसका नंबर 14वी भरती में आएगा। जबकि पुरानी व्यवस्था में 13 में से आधे अर्थात 7 स्थान अनारक्षित वर्ग के लिए रखकर ओबिसी को 3, एस.सी. को 2 व एस.टी. को 1स्थान आरक्षण में सुनिश्चित होता। यह सामाजिक न्याय प्रदत्त करनेवाली सर्व समावेशी व्यवस्था। सम्पूर्ण संस्थानों को इकाई नहीं मानने से अब एस.टी. वर्ग के लिए तो उच्च शिक्षण संस्थाओं के अध्यापन वर्ग में रास्ता ही बंद हो जाएगा।

अभी केन्द्रीय उच्च शिक्षण संस्थाओं में पाँच से छह हज़ार पद रिक्त है। पुरानी आरक्षण व्यवस्था में जनजातियों को 350/400 स्थान मिलने निश्चित थे, नई व्यवस्था में उन्हें 25/30 स्थान भी नहीं मिलेंगे और भविष्य का रास्ता भी रूक जाएगा। इसी अनुपात में ओबिसी, एससी व दिव्यांगों को भी अपूरणीय क्षति होगी।

यह स्थिति व्यवस्था अपने देश के सम्पूर्ण जनजाति समुदाय के लिये अन्यायकारी और संविधन में आरक्षण देने के प्रावधान करने की समता मूलक भावना के नितांत विरूद्ध रहे। विकास की गति में पहले से ही पिछडे़ जनजाति समुदाय, विशेष कर के युवकों में इस व्यवस्था के विरूद्ध आक्रोश उत्पन्न होना स्वाभाविक है।

हमें विदित हुआ है कि केन्द्र सरकार के पास इस अन्यायकारी निर्णय में से मार्ग निकालने के लिए एक प्रस्ताव/ड्राफ्ट/बिल गत कुछ महीनों से विचाराधीन है। हम केन्द्र सरकार से मांग करते हैं कि विषय की संवेदनशीलता, इसके सभी सम्भावित सामाजिक, राजनैतिक परिणामों को ध्यान में रखकर तत्काल एवं अध्यादेश के द्वारा इस अन्यायकारी परिणाम वाले विषय पर जनजातियों को न्याय दिलाने कि अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी को पूरा करे और उच्च शिक्षण संस्थाओं में पूर्व की 200 सूत्रीय आरक्षण व्यवस्था को बहाल करे।

कल्याण आश्रम राज्य सरकारों से भी मांग करती है कि राज्यों के राज्य पोषित उच्च शिक्षण संस्थानों में वे भी ना केवल पुरानी व्यवस्था को बहाल करे वरन उनमें राज्य की जनजाति जनसंख्या के अनुपात में सभी शासकीय निजी उच्च शैक्षणिक संस्थाओं में संविधान की मूल भावना के अनुसार यह आरक्षण लागू करे।

कल्याण आश्रम देश की सभी शासकीय सहायता प्राप्त तथा कथित अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थाओं का भी आह्वान करती है कि यदि वे वास्तव में देश के पिछडे़ समुदायों एससी/एसटी को सामाजिक न्याय मिले इसके पक्षधर है तो वे भी आगे बढ़कर अपने संस्थानों में इनका आरक्षण सुनिश्चित करें। देश का जनजाति समाज सब देख समझ रहा है।

उपरोक्त मांग को लेकर वनवासी कल्याण आश्रम का एक प्रतिनिधि मण्डल दिल्ली में राष्ट्रपति जी, केन्द्रीय गृहमंत्री जी, जनजाति कार्य मंत्री जी व राष्ट्रीय जनजाति आयोग से भी मिलने वाला है।

 

                                                                     जगदेवराम उरांव

                                                           अध्यक्ष, .भा. वनवासी कल्याण आश्रम

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