खेल विश्व और अपना भारत

दिसम्बर 2018 के अंत में गुवाहाटी (असम) में अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम द्वारा राष्ट्रीय खेल महोत्सव का भव्य आयोजन किया गया। इस प्रतियोगिता में देश भर के जनजाति युवक-युवतियों ने उत्साह से भाग लिया। वहां पर एक स्मारिका का प्रकाशन भी हुआ।

हम वनबन्धु पत्रिका के पाठकों के लिये निम्न लेख उस स्मारिका से प्राप्त कर साभार प्रकाशित कर रहे है।

खेल, अपने जीवन का एक अंग है। कोई खिलाड़ी तो कोई दर्शक, कोई प्रशिक्षक तो कोई निरीक्षक, सबकी अपनी अपनी कोई एक भूमिका है। मैदान पर खेल होता है तो खेलने वाले और न खेलने वाले दोनों आनंद लेते हैं। हम अपने महत्वपूर्ण व्यक्तिगत कामों को कुछ समय के लिये भूल जाते हैं और खेलमय हो जाते है। यह अनुभव बचपन में कई बार हमें आया होगा। घर से माँ बुला रही तो भी बालक,‘आता हूँ, आता हूँ’ कहते रहता है और मोहल्ले में खेल पूरा होने के बाद ही घर जाता है। बचपन में खेलने में मस्त रहने का अनुभव सबको होगा। किसी का बचपन खेले बिना नहीं हो सकता है चाहे वह बालक श्रीमंत घर का हो, या किसी गरीब़ परिवार का। ‘खेल बचपन का एक अभिन्न अंग है’-कहना भी कोई अतिषयोक्ति नहीं है। यदि बडे़ होने के बाद भी अपना ‘मन’ बालक के समान है तो व्यक्ति अपनी आयु भूलकर खेल में मग्न हो जाता है।

वर्तमान समय का विचार करेंगे तो विश्व में सबसे अधिक देश फुटबाॅल खेलते है। क्रिकेट अधिकतम वे देश खेलते हैं जो अतीत में कभी अंग्रेंजों के आश्रित रहे हैं। अंग्रेजों ने जहाँ जहाँ राज किया वहाँ वे अंग्रेजियत छोड़ कर गये। भारत भी इसमें अपवाद नहीं है। उन्होंने क्रिकेट को भी उस देश के लोगों में ऐसा परिचित कर दिया कि उनके जाने के बाद भी वह देश क्रिकेट खेलता रहा। एक खेल के रूप में क्रिकेट की हमें समीक्षा नहीं करना है, परन्तु इतना निश्चित है कि भारत में क्रिकेट का बुख़ार यह मानसिकता से अधिक सम्बन्ध रखता है।
कहते है कि अंग्रेज 1947 में चलें गये परन्तु अंग्रेजियत आज भी भारत में है। इसका एक उदाहरण है क्रिकेट।

वैसे भारत का राष्ट्रीय खेल हाॅकी है। हाॅकी के विश्व में कई वर्षों तक भारत ने राज किया है। आज भी ‘भारत का मन’ एक बार तय कर ले, तो देश का युवा फिर से हाॅकी में विश्व के प्रथम स्थान पर पहुंच सकता है। प्रश्न है भारतीयता को प्राधान्य देना और भारत के मन को पहचानना।
भारत के विभिन्न क्षेत्रों में खेल यह न केवल व्यक्तिगत परन्तु सामुहिक जीवन का भी हिस्सा रहा है। ‘विविधता’ वैसे भी भारत की विशेषता है, तो खेल में भी विविधता बहुत है। एक विशेष बात यह भी है कि अधिकतम भारतीय खेल में साहस, कौशल, चपलता जैसे गुणों के साथ संस्कार के भी दर्शन होते हैं। प्रामाणिकता, सच को स्वीकार करने की मानसिकता जैसे कई संस्कारों का सिंचन खेल के माघ्यम से होता है।

विश्व के अन्य देशों में जितने प्रकार के खेल हैं उनसे भारत का खेल, एक बात पर अलग है – वह है पुनर्जन्म की संकल्पना। हम कबड्डी खेलते हैं, उसमें खिलाड़ी बाद होता है (आउट होता है) और कुछ ही समय में वह पुनः जीवित भी होता है। यह केवल भारत में ही सम्भव है।
कुछ समय से इस कबड्डी को लीग मैच के आयोजन द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर और कुछ मात्रा में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी प्रतिष्ठा मिलते दिखाई देती है। इस हेतु आर्थिक सहयोग करने वाले भी मिलने लगे हैं। विश्व के अन्य देश भी कबड्डी खेलने में रूचि दिखा रहे हैं। परन्तु खेद इस बात का है मानव जीवन का सर्वांग सुंदर विचार करने वाले इस खेल को आॅलम्पिक में स्थान नहीं है। भारत के किसी राज्य से भी छोटे देश, जो आॅलम्पिक में अपने कौशल का प्रदर्शन करते है, प्रश्न यह है कि हम क्या कर रहे हैं ? इतना बड़ा देश होते हुए भी हम कबड्डी को आॅलम्पिक तक पहुंचाने में अभी तक सफल नहीं हुए हैं। हमारे देश के सभी राज्यों मै कबड्डी के खिलाड़ी मिलते हैं। हम यदि इसकी प्रतिष्ठा बढ़ायेंगे तो विश्व भी उसको स्वीकार करेगा। जैसे ‘योग दिवस’ के माध्यम से भारत के योग को जैसे आज अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा मिली है वैसे हाॅकी और कबड्डी को भी मिल सकती है। समाज और शासन दोनों को इस पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।

किसी भीे खिलाड़ी के पास जो कौशल होना चाहिए, जो गुण होने चाहिए उसके लिये प्रशिक्षण का बड़ा महत्व है। यदि प्रशिक्षण मिला तो खिलाड़ी आगे बढ़ सकता है। वनवासी कल्याण आश्रम ने इस बात का अनुभव किया है। हम जनजाति क्षेत्र की खेल प्रतिभा को ढूंढते हैं, उसे प्रशिक्षित करते हुए खेलने के लिये अवसर प्रदान करते हैं। जिसके कारण न केवल राज्य स्तर पर परन्तु राष्ट्रीय स्तर पर भी जनजाति खिलाड़ियों ने अन्य खिलाड़ियों जैसा ही कौशल दिखाया है। कई खेलों में विजय प्राप्त की है। राष्ट्रीय स्तर पर खेलें, फिर विशेष प्रशिक्षक के पास अच्छा प्रशिक्षण लेकर अंन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व किया और भारत का गौरव बढ़ाया ऐसे कई अनुभव हैं। जनजाति जंगल के रहने वाले, उनका तीरंदाजी से अधिक परिचय होने के कारण तीरंदाजी क्षेत्र में हमें कई खिलाड़ी मिले हैं। उडती चिड़िया को गिराने वाले आज भी जंगल में है, वे यदि हमारे साथ आएँ तो किसी भी निशाने पर बड़ी सहजता से तीर चला सकते हैं।

 

वैसे जनजाति खिलाड़ी की क्षमता भी विशेष होती है। दौड की स्पर्धा में वनवासी खिलाडी बड़ी सहजता से अपनी क्षमता का परिचय देता है। एक बार सब-ज्युनियर आयु गट की 21 कि.मी. की अर्ध-मैरेथाॅन दौड़ में एक बालक प्रथम आया। हमें लगा की विजयी रेखा पार कर अब वो थोडा विश्राम करता होगा। इसलिये उसे मिलने गये तो पता चला कि वो दुसरे क्रमांक पर कौन आ रहा है ? की प्रतिक्षा कर रहा था। इतना दौड़ने के पश्चात हम मानते थे उतना वह थका नहीं था। प्रतिदिन जंगल-पहाड़ों में चल कर जाने का, परिश्रम करने का अनुभव होने के कारण वन क्षेत्र के बालक की क्षमता बहुत अच्छी होती है। हमें उस क्षमता को पहचानना, प्रशिक्षित करना और अवसर प्रदान करना इतना ही करना है। इसके चलते कई खिलाड़ी एक छोट़े से वनवासी गाँव से राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक खेलेंगे और भारत का गौरव बढ़ायेंगे, इसमें कोई शंका को स्थान नहीं।

– प्रमोद पेठकर (दिल्ली)
प्रचार प्रमुख,
वनवासी कल्याण आश्रम

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