15 नवम्बर पर ‘बलिदान दिन’ निमित्त विशेष लेख

हमारी ‘धरती के आबा’ भगवान बिरसा मुंडा

वनवासी समाज के नायक बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवम्बर 1874 को झारखंड के उलिहातु गाँव में हुआ था। बृहस्पतिवार के दिन जन्म होने के कारण उनका नाम बिरसा रखा गया था। उनके पिता का नाम सुगना मुंडा और माता का नाम करमीहटू था। यह जानकर बड़ा दुःख होता है कि बिरसा का पूरा परिवार इसाई बन गया था बिरसा की पढ़ाई चाईवासा के मिशन स्कूल में हुई। कई बातों में बिरसा अपने अध्यापक के साथ असहमत रहते थे जो उनके विद्रोही स्वभाव को प्रकट करता है।

ईसाई फादर के साथ न बनी तो स्कूल से निकालने के बाद उनका संपर्क आनंद पाण्डे से हुआ। पाण्डे जी से उनको पौराणिक कथाओं व पात्रों का ज्ञान हुआ। इसके बाद उन्होंने समाज को जाग्रत करने का काम शुरु किया। परिणामस्वरूप उनकी बातों का प्रभाव बढ़ा और उस क्षेत्र में इसाई धर्म मानने वालों की संख्या घटने लगी।

बिरसा ने किसानों का शोषण करने वाले जमीदारों के विरूद्ध भी संघर्ष करना प्रारम्भ किया, लोग उनसे जुड़ने लगे। इस पर पुलिस ने उनको गिरफ्तार कर दो वर्ष के लिए हजारीबाग जेल में डाल दिया।

वहां से छूटने के बाद बिरसा ने अपने अनुयायियों के दो दल बनाए, एक दल धर्म का प्रचार करने लगा तो दूसरे को उन्होंने जमीदारों के शोषण के खिलाफ लगा कर अपना अभियान शुरु किया।

1897 से 1900 के बीच बिरसा के साथी और अंग्रेज सिपाहियों के बीच युद्ध होते रहें। उन्होंने अंग्रेजों की नाक में दम कर रखा था। अगस्त 1897 में बिरसा और उसके चार सौ सिपाहियों ने तीर-कमानों से लैस होकर खूँटी थाने पर धावा बोला। 1898 में तांगा नदी के किनारे मुंडाओं की भिड़ंत अंग्रेज सेनाओं से हुई जिसमें अंग्रेजी सेना हार गयी जिसके बाद कई जनजाति नेताओं की गिरफ्तारियाँ हुईं। बिरसा को पकड़वाने के लिए अंग्रेजों ने पांच सौ रुपये का इनाम रखा था जो वैसे देखें तो उस समय बहुत बड़ी रकम थी। बिरसा मुंडा और अंग्रेजों के बीच अंतिम और निर्णायक लड़ाई 1900 में रांची के पास डोम्बरी पहाड़ी पर हुई। हजारों की संख्या में पराक्रमी मुंडा, बिरसा के नेतृत्व में लड़े पर तीर-कमान और भालें कब तक बंदूकों और तोपों का सामना करते ? लोग बेरहमी से मार दिए गए। अंग्रेज जीत गये लेकिन बिरसा हाथ नहीं आए। जहां बंदूकें और तोपें काम नहीं आईं वहां पांच सौ रुपये ने काम कर दिया। परिणामस्वरूप वे पकडे़ गये। बिरसा ने अपनी अंतिम साँस रहस्यमय ढंग से 9 जून 1900 को जेल में ली। कहा जाता है कि बिरसा को अंग्रेजों ने विष देकर मार दिया था।

बिरसा को उनके दर्शन के लिए ‘‘आबा’’ भी कहा जाता है, आबा का अर्थ भगवान होता है आज जब झारखण्ड में इसाई पादरी धर्मान्तरण को बढ़ावा दे रहे है तब मानो ! हमें फिर से बिरसा आबा की जरुरत है मुझे इस सन्दर्भ में एक कविता याद आती है –

बिरसा तुम्हें कहीं से भी आना होगा
घास काटती दराती हो
या लकड़ी काटती कुल्हाड़ी
यहां-वहां से, पूरब-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण से
कहीं से भी आ मेरे बिरसा
खेतों की बयार बन कर
लोग तेरी बाट जोहते.


भगवान बिरसा मुण्डा के उपदेश का सार

  • ईश्वर याने सिंगबोंग एक है।
  • गाय की सेवा करो एवं समस्त प्राणियों के प्रति दयाभाव रखो।
  • नशा मत करो, अशुद्ध भोजन मत करो।
  • सादा रहो, घर साफ-सुथरा रखो अपने घर मे तुलसी का पौधा लगाओ।
  • बड़ो का आदर करो, कुसंगति से बचो।
  • इसाइयों के मोह जाल में मत फंसो।
  • पर धर्म से अच्छा स्व-धर्म है
  • अपनी संस्कृति, धर्म और अपने पूर्वजों के प्रति अटूट श्रद्धा रखो।
  • एकजूट रहो, कभी आपस मे मत लड़ो।
  • सप्ताह में एक दिन बृहस्पतिवार को सिंगबोंग ‘भगवान’ की पूजा करो, हल मत चलाओ।
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