धरती के आबा स्वतंत्रता सेनानी-बिरसा मुण्डा

 

(9 जून 1875 – 15 नवम्बर 1900)

दुश्मनों ने तुम्हें पकड़ा था,
तुम्हारे हाथों में लोहे की जंजीर थी |
किन्तु तुम्हारे मन में कोई चिंता नही,
तुमने देश के लिए प्राण दे दिये |
हम तुम्हे युगों तक नही भूलेंगे ,
हम आज तक तुम्हारे गीत गाते हैं,
हम तुम्हें युगों तक जोहार करेंगे ||

एक मुंडारी लोक गीत की उपर्युक्त पंक्तियां छोटानागपुर के क्रांति के महानायक भगवान बिरसा मुण्डा के लिए समर्पित है |
भारत वर्ष के विभिन्न प्रान्तों में बसी लगभग 300 जनजातियां जब अपने सपूतों की गौरव गाथा को याद करने बैठती है तो एक स्वर्णिम नाम उभरता है – बिरसा मुण्डा | जिसे अपने जनजाति बन्धु बड़े प्यार और श्रद्धा के साथ बिरसा भगवान के रूप में नमन करते हैं| जनजाति समाज नें एक नही अनेकों रत्न दिए हैं देश को | मणिपुर के जादोनांग, नागा रानी गाईदिन्ल्यु, राजस्थान के पूंजा भील, आंध्रप्रदेश के अल्लूरी सीताराम राजू, बिहार-झारखण्ड के सिध्दू–कान्हू, तिलका मांझी, जतरा भगत, केरल के पलसी राजा तलक्कल चंदू, महाराष्ट्र के वीर राघोजी भांगरे, असम में शम्भूधन फुन्गलोसा आदि पर किसे गर्व नहीं होगा? बिरसा मुण्डा इन सबके प्रतीक हैं|

जन्म: छोटानागपुर (झारखण्ड) के उलीहातू ग्राम में 15 नवम्बर 1875 के दिन इस लाल का जन्म हुआ | इनका जन्म बृहस्पतिवार को हुआ था इसलिए नाम रखा बिरसा | पिता सुगना मुण्डा और माता करमा अत्यन्त निर्धन थे और दूसरे गाँव में जाकर मजदूरी का काम किया करते थे | उनके दो भाई दो बहनें भी थी|

बिरसा का बचपन समान्य वनवासी बालक की तरह ही धूल में खेलते–लोटते हुए, जंगलो में विचरते, भेड़-बकरियां चराते हुए मस्ती में बीतने के बावजूद भी असामान्य था | उनके बासुरी वादन से पशु-पक्षी भी एकाग्रचित्त हो आनन्दमग्न हो जाते थे | वे अखाड़े-मैदान में काफी झूम–झूम कर नाचा करते थे | बड़ा होने पर गरीबी के कारण बिरसा के माता–पिता ने उसे कुछ दिन उसकी मौसी के घर तो कुछ दिन मामा के घर रखा |

शिक्षा: बालक बिरसा को उनके पिता पढा–लिखा कर बड़ा साहब बनाना चाहते थे | माता पिता ने उन्हें मामा के घर आयूबहातू भेज दिया जहाँ बिरसा ने भेड़-बकरियां चराने के साथ–साथ शिक्षक जैपाल नाग से अक्षर ज्ञान और गणित की प्रारम्भिक शिक्षा पाई | यहीं पर वे एक इसाई धर्म प्रचारक के संम्पर्क में भी आए जो भोले-भाले वनवासियों को पढाने के बहाने एकत्र करके धर्म प्रचार का काम किया करता था | यह अंग्रेज पादरियों की सोची समझी चाल थी | इन पादरियों के माध्यम से वे वनवासियों के अभावग्रस्त जीवन और सरलता का लाभ उठाकर उन्हें ईसाइ बनाते और आम भारतवासी से अलगथलग कर “फूट डालो और राज करो” की नीति पर अमल करते थे|
ईसाइ मिशनरियों के चंगुल में आकर बिरसा के पिता ने भी ईसाइ धर्म अपना लिया | वे सुगना मुण्डा से मसीह दास बन गए | बिरसा जब ग्यारह वर्ष के थे उस समय उनका भी बपतिस्मा हुआ और उन्हें नाम दिया गया- दाऊद | इसके बाद उन्होंने बुर्जू में प्राथमिक शिक्षा पाई | बपतिस्मा के समय जब बिरसा की शिखा काटी गई थी तब उनके मन को बड़ा आघात लगा था | आगे की पढाई के लिए वे चाईबासा के लूथरेन मिशन स्कूल में दाखिल हुए | मिशन के छात्रावास में भोजन के साथ गोमांस परोसा जाता था | मुण्डा परिवार, विशेषकर जिस परिवार में बिरसा ने बाल्य जीवन बिताया था, वहाँ गौ को पूजा जाता था अतः बिरसा ने गौ-मांस खाने से साफ इंकार कर दिया|

बिरसा ने ईसाइयों के षड़यंत्र को भाँप लिया और उनके तन–मन में अंग्रेजों के प्रति घृणा की ज्वाला भडक उठी | उस ग्यारह वर्षीय बालक ने पादरी नोट्रट के समक्ष उसी समय कह “डाला, साहब–साहब एक टोपी हैं, याने अग्रेज पादरी भी वैसे ही हैं जैसे कि भारतीयों पर अत्याचार करने वाले अंग्रेज अधिकारी | बिरसा अब एक दिन भी चाईबासा नही रहेगा | इस अटल संकल्प को लेकर घर वापस लौटने वाला बिरसा बिलकुल बदल चुका था |

1891 में चाईबासा से लौटने के बाद बिरसा बंदगाँव आ गए, वहाँ वे वैष्णव धर्मावम्बी आनन्द पाण्डे के सम्पर्क में आए | आनन्द पाण्डे उन्हें रामायण, महाभारत आदि की कहानियाँ सुनाया करते | इसी समय चैतन्य महाप्रभु का आगमन छोटानागपुर क्षेत्र में हुआ था | वे उनके अनेक शिष्यों के सम्पर्क में आये तथा उनके भजन–कीर्तन से बिरसा काफी प्रभावित हुए. फलत: बिरसा को इनमें अपने इतिहास, धर्म, संस्कृति आदि की पहचान मिली | बिरसा ने मांस भक्षण त्याग दिया, वे जनेऊ पहनने लगे, सर पर पीली पगड़ी बाँधने लगे और तुलसी की पूजा करने लगे | उन्होंने नए पंथ की नींव डाली जिसे बिरसाइत पंथ कहा जाने लगा | अधिकाधिक लोग उनके अनुयायी बनने लगे | ऐसा होते होते एक जन आन्दोलन जाग उठा |

अब बिरसा ने अपने कार्यक्रमों और योजनाओं को ठोस रूप देना प्रारंभ किया | उन्होंनें मुण्डा युवकों का एक संगठन बनाया, सामाजिक सुधारो के साथ–साथ राजनीतिक शोषण के विरुद्ध भी जन मानस को कुरेदना शुरु किया | उन दिनों पादरियों के इशारों पर उनके पिट्टू जमीदार वनवासियों पर अत्याचार करते थे | बिरसा ने इस षडयंत्र के विरुद्ध जनता में जागृति पैदा की और अंग्रेजों का विरोध करने के लिए आगे आने का आह्वान किया | चलकद में दिये गये उनके ऐतिहासिक भाषण के कुछ अंश:- “अंग्रेज शासक और गोरे विदेशी पादरी-फादर मिल कर इस देश को भ्रष्ट करने पर उतारू हैं | दोनों की टोपियां एक है, दोनों के लक्ष्य एक है | वे हमारे देश को गुलाम बनाना चाहते हैं | वे पहले हमारे धर्म-कर्म को बदल कर ईसाइ धर्म की स्थापना करते हैं | वे हमारी शिखा और जनेऊ की जगह क्रूस टांगना सिखाते हैं | हमारा सनातम धर्म, हमारे पवित्र पूजा स्थल, हमारे अखाड़े दिनों-दिन उजड़ते जा रहे हैं| हमारा नाम, हमारा पोशाक और हमारी पहचान ही खत्म होती जा रही है | यदि ऐसा ही होता रहा तो हमारे आदिवासी समाज का नाम इस दुनिया से उठ जाएगा |”
बिरसा के इस शंखनाद से जनजाति युवक जाग उठे | चलकद ग्राम में ही एक आश्रम, एक आरोग्य निकेतन और एक क्रांति केन्द्र बन गया | झुंड के झुंड लोग चलकद की ओर बढने लगे | विरोध के प्रथम चरण के रूप में एक असहयोग आन्दोलन आरंभ किया गया| बिरसा धरती के आबा (भगवान) के रूप में जाने जाने लगे |

कलियों को कुचलने का प्रयास: बिरसा आन्दोलन के वृक्ष में नित नई कलियां चटकने लगी | ईसाइ मिशनरी भौचक्के रह गये | वे दौड़े अपने अंग्रेज आकाओं के पास – “एक नया सन्यासी हिन्दू राजा बना है जो वनवासियों को अंग्रेजी राज के खिलाफ भड़का रहा है |” ब्रिटिश सरकार ने तत्काल बिरसा की गिरफ्तारी का आदेश दिया | पुलिस उन्हें पकड़ने चलकद पहुंची लेकिन ग्रामिणों के सशक्त विरोध ने बन्दूकों से लैस पुलिस को भी थर्रा दिया और वह बिना गिरफ्तार किये वापस लौट गई | अंग्रेज सरकार ने एक विशेष बैठक कर हर संभव उपाय द्वारा बिरसा विद्रोह को कुचलने का आदेश दिया | 25 अगस्त 1895 को छल प्रपंच से पुलिसे उन्हें गिरिफ्तार करने में सफल हो गई | वे हजारी बाग जेल लाये गए|

30 नवम्बर 1897 को जब बिरसा रिहा हुए उस समय सारा वनवासी आँचल मन-प्राण में बारूदी इच्छाएँ लिये दहक रहा था | वे सब तीर धनुष के साथ आन्दोलन छेड़ देने की योजना बनी | अंग्रेजों के पिट्ठू जमींदारों को लगान न देने, जमीन को मालगुजारी से मुक्त करने, मुण्डाओं के जंगल का अधिकार वापस करने तथा अंग्रेजों और मिशन के लोगों से भारत छोड़ कर चले जाने की मांग जोर पकड़ने लगी | ईसाइ पादरियों के खिलाप घृणा और आक्रोश बढ़ता गया | बिरसा के प्रधान सेनापति गया मुण्डा के नेतृत्व में बुर्जू मिशन और बंदगांव मिशन पर धावा बोल दिया गया | रांची के जर्मन मिशन पर भी हमका किया गया | 9 जनवरी 1900 के दिन बिरसा ने जोजोहातु के निकट डूम्बारी पहाडियों में एक सभा आयोजित की जिसमे हजारों की संख्या में वनवासी भाई बिरसा की महिमा के गीत गाते, माथे पर चन्दन का तिलक लगाए, हाथ में सफ़ेद और लाल पताका लिए वहाँ एकत्र हुए | सफ़ेद पताका शुद्धता तथा स्वदेशी की प्रतीक थी और लाल पताका शोषण और अत्याचार के विरुद्ध क्रांति की | कमिश्नर स्ट्रीट फील्ड को खबर मिली तो उसने पूरे पहाड़ को घेर लिया | आन्दोलनकारियों पर अन्धाधुन्ध गोलियां चलाई गई | इधर बंदूकें थी, उधर पत्थर और तीर-धनुष | हजारों के खून से पहाड़ी रंग गई | डूम्बारी पहाड़ पर अंग्रेजों के दमनचक्र की विभीषिका जलियांवाला बाग कांड से कम नहीं थी | अंततः अंग्रजों ने डूम्बारी पर्वत पर कब्ज़ा कर लिया, लेकिन मुक्ति-नायक बिरसा उनके हाथ नहीं लगे |
बिरसा को गिरफ्तार करने ‘विट एंड सर्च’ ऑपरेशन चलाया गया | उनकी गिरफ़्तारी के लिए 500 रूपये का ईनाम घोषित किया गया | बिरसा का पता जानने के लिए बड़ी क्रूरता से लोगों का दमन और उत्पीडन किया गया | अंत में 3 फरवरी को गुप्तचरों और भेदियों की मदद से बंदगाव में उन्हें पकड़ लिया गया | उन्हें हथकड़ी पहनाकर रांची जेल लाया गया उनकी गिरफ्तारी की खबर दावानल की तरह फ़ैल गई और पूरा क्षेत्र सुलग उठा |

9 जून 1900 के दिन जेल में स्वतंत्रता के इस महानायक की रहस्यमय ढंग से रांची जेल में मृत्यु हो गई | कहा गया कि उन्हें हैजा हो गया था लेकिन लोगों की धारणा थी की उन्हें जहर दिया गया था | चुपचाप एक नाले के किनारे उन्हें जला दिया गया |
चर्च का धर्मान्तरण के द्वारा जनजाति संस्कृति को नष्ट करने का कुचक्र चल रहा है तो उसे बचाने का प्रयास भी कभी बंद नहीं हुआ है | दीप से दीप जलाते रहे तो काली रात का अँधेरा एक न एक दिन अवश्य मिटेगा |

ऐसे हमारे जनजाति समाज के महानायक का चरित्र से आज भी हमें अपना देश-धर्म-संस्कृति की रक्षा एवं संवर्धन की प्रेरणा मिलती है | उनकी जयंती हमारे जनजाति समाज के आत्म गौरव का दिन है | आज हम अपने सभी वीरों को याद करें | इन सारे महापुरुषों ने सारे देश और समाज को जोड़ने का कार्य किया है | आज आवश्यकता है की इस पावन घड़ी में हम इस महान कार्य को आगे बढ़ाने का संकल्प करें |

भगवान बिरसा मुण्डा के उपदेश का सार
1. ईश्वर याने सिंगबोंगा एक है |
2. गौ की सेवा करो एवं समस्त प्राणियों के प्रति दयाभाव रखो |
3. नशा माता करो, अशुद्ध भोजन मत करो |
4. सादा रहो, घर साफ-सुथरा रखो, अपने घर में तुलसी का पौधा लगाओ |
5. बड़ों का आदर करो, कुसंगति से बचो |
6. इसाईयों के मोह जाल में मत फंसो |
7. पर धर्म से अच्छा स्व-धर्म है |
8. अपनी संकृति, धर्म और अपने पूर्वजों के प्रति अटूट श्रद्धा रखो |
9. धर्म–संस्कृति, परम्परा को भूलने से समाज की पहचान मिटती है |
10. एकजूट रहो, कभी आपसमे मत लड़ो |
11. सप्ताह में एक दिन बृहस्पतिवार को सिंगबोंगा (भगवान) की पूजा करो, हल मत चलाओ |

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