PROTECTION OF JANJATI’S RIGHTS (हित रक्षा )

‘हितरक्षा’ कहते ही अर्थ स्वयं स्पष्ट हो जाता है। वर्षों से जिन पर अन्याय हो रहा है, जिनका शोषण हो रहा है, एसे अपने वनवासी बन्धुओं के हितों की रक्षा। वैसे कल्याण आश्रम की स्थापना से लेकर आज तक हमने ऐसे कई उपक्रम किये, ऐसे कई कार्यक्रम आयोजित किये, जिसके पीछे वनवासी समाज के हितों की रक्षा का ही उद्देश्य रहा।

वनवासी कल्याण आश्रम के स्थापक वनयोगी बालासाहब देशपाण्डेजी पेशे से वकील थे। उन्हें स्वयं भी कोर्ट-कचहरी से लेकर विभिन्न सरकारी कामों में वनवासी बन्धुओं को हितरक्षा के रूप में कई बार सहायता की है। उनके पास यदि कोई वनवासी बन्धु आया, कोर्ट का काम तो है परन्तु दूसरी ओर निर्धनता के कारण लाचार है, तो वे कई बार कम पैसे में उसका काम करते। कभी कभी तो बीना पैसे भी उसका काम करते।

हम अपनी बैठकों में ऐसे विषयों पर चर्चा कर विभिन्न प्रकार के प्रस्ताव पािरत करते है। अपने हितरक्षा विभाग द्वारा वनवासी समाज के पक्ष में समय-समय पर सरकारी कार्यालयों में ज्ञापन देना, सभा-सम्मेलनों के माध्यम से दबाब डालना जैसे कई प्रयास चलते रहते है। कई स्थानों पर रैलियों का आजोजन कर समाज में अन्याय के सामने शक्ति खड़ी करना भी आवश्यक होता है। समाजहित मे नेतृत्व पनपता है, जो अपने अधिकारों की रक्षा हेतु सक्रीय होते हुए भी सामाजिक सद्भावना को हानि न पहुँचे, ऐेसे कार्यक्रमों का आयोजन करता है।

हम अपनी बैठकों में ऐसे विषयों पर चर्चा कर विभिन्न प्रकार के प्रस्ताव पािरत करते है। अपने हितरक्षा विभाग द्वारा वनवासी समाज के पक्ष में समय-समय पर सरकारी कार्यालयों में ज्ञापन देना, सभा-सम्मेलनों के माध्यम से दबाब डालना जैसे कई प्रयास चलते रहते है। कई स्थानों पर रैलियों का आजोजन कर समाज में अन्याय के सामने शक्ति खड़ी करना भी आवश्यक होता है। समाजहित मे नेतृत्व पनपता है, जो अपने अधिकारों की रक्षा हेतु सक्रीय होते हुए भी सामाजिक सद्भावना को हानि न पहुँचे, ऐेसे कार्यक्रमों का आयोजन करता है।

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