URBAN JANJATI  (नगरीय वनवासी सम्पर्क)

सन् 1947 में अंग्रेज यहाँ से चले गये। अपने देशवासियों के हाथों में देश की बागडोर आई। विविध प्रकार की योजनाओं को कार्यान्वित किया गया। समय के चलते कुछ मात्रा में विकास भी हुआ। इसका लाभ अपने जनजाति बन्धुओं को भी मिला। शिक्षा का स्तर, रोजगार के अवसर, विविध प्राथमिक सुविधाओं की उपलब्धता इत्यादि। वनवासी क्षेत्र में वे सारा जितने प्रमाण में मिलना चाहिये उनते प्रमाण में मिला है कि नहीं, यह चर्चा का विषय हो सकता है। परन्तु कुछ भी नहीं हुआ ऐसा नहीं है। इसके चलते अपने वनवासी बन्धु, जिन्होंने अच्छी शिक्षा प्राप्त की, उनमें से कुछ सरकारी अधिकारी बने, तो कुछ विविध व्यवसाय हेतु नगरों में आकर बसें। आज सारे वनवासी वन क्षेत्र में ही रह रहे है, ऐसा नहीं है। वनवासी अथवा जनजाति बन्धुओं की संख्या आज नगरों में भी है। चकाचैंध नगरीय जीवन में ये सारे कहीं खो न जाए, यह भी तो देखना होगा। अपने कार्यकर्ता बैठकों में ‘नगरों में इन बन्धुओं से सम्पर्क की व्यवस्था होनी चाहिये’ ऐसा विषय चला।

वर्तमान में छोटे छोटे गाँवों में रह रहे कई वनवासी बन्धु आरोग्य सेवा हेतु अथवा रोज़गार पाने नगरों में आते है। वहाँ वे जानकारी न होने से इधर उधर भटकते रहते है। नगर में रहनेवाले जनजाति बन्धुओं को ऐसे बन्धुओं की सहायता करनी चाहिए।

साथ-साथ नगर में रहनेवाले जनजाति भाई अपने गाँव को भूल जायें, यह भी तो ठीक नहीं है। उन्होंने भी समय-समय पर अपने गाँव वहाँ कुछ विकास हो, इस हेतु कार्य करना चाहिये। ग्रामीण भाइयों को कुछ न कुछ मार्गदर्शन करना चाहिए, ताकि वे भी विकास कर सके।

इन सभी बातों के सन्दर्भ में नगरों में उनका सम्पर्क करना, सम्पर्क कर प्रबोधन करना आवश्यक हो गया। इसी में चल पड़ा नगरीय जनजाति सम्पर्क विभाग। धीरे-धीरे इस विषय के सन्दर्भ में भी कार्यकर्ताओं ने कार्य करना प्रारम्भ किया। इसमें नगरीय कार्यकर्ताओं की बड़ी भूमिका रही। विविध प्रकार के अनुभव सामने आये। जैसे जैसे कार्य चला, उसके चलते इस आयाम का महत्व अपने आप ध्यानाकर्षित करते गया। कार्य की समग्र येाजना में ऐसे विविध् आयामों का अपना-अपना महत्व होता है। सबकी अपनी अपनी गति होती है। हम यदि कार्य करते है तो समाज हमें अवश्य सहयोग करता है, इसकी भी अनुभूति होते रहती है। आवश्यकता है केवल सतत कार्य करते रहने का।

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