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अब जागो भारतवासी
जन जन जिनकी पुजा करतॆ
चरैवेति चरैवेति यही तो मंत्र है अपना
दूर दूर गॉंवों में जाएे वनबन्धु को मिलाने
जग उठा वनवासी अब तो, जग उठा वनवासी
वनवासी का संगठन कर ध्येय मार्ग पर चलते
वैभवशाली भारत के हम स्वप्न देखती महिलाएं
धरती माता कितनी अच्छी
आनंद भरें सबके जीवन में , जीवन के दिन चार
खेल खिलाडी खेल
शारदे वर दें ! हमें करुणामयी आशिष दे

 


अब जागो भारतवासी

 

अब जागो……जागो रे जागो वनवासी
अब जागो…..जागो भारतवासी ।। धृ.।।

सरल सहज अपना जीवन है,
निर्मल जल सम अपना मन है,
किन्तु सजगता रखना ही तो (2)
समय का है संदेश………………।। 1।।

अब जागो……जागो रे जागो वनवासी
धर्म हमारे जीवन में है,
श्रद्धापूर्वक अड़ीग रखें है,
विधर्मी चाहे कितना कहते ? (2)
कैसे बदले भाई……………………..।। 2।।

अब जागो……जागो रे जागो वनवासी
पुरखों ने हमें मार्ग दिखाया,
ये जीवन ज़ीना सिखलाया,
ईश्वर देख रहा है सबकेा, (2)
कैसे जियें हम भाई…………………।। 3।।
अब जागो……जागो रे जागो वनवासी

 


जन जन जिनकी पुजा करतॆ


जन जन जिनकी पूजा करते
वन अंचल के देव हमारे
श्रद्धा मेरी दैवत सारे,
श्रद्धा मेरी दैवत सारे ।।धृ.।।
वृक्ष देव है पर्वत भी है
चंद्र देव है सूरज भी है
व्याघ्र देव नाग देव है
परमेश्वर के रूप सारे ।।1।।
श्रद्धा मेरी दैवत सारे ।।धृ.।।
नाम कई है रूप अनेकों
विध विध पूजा स्थान अनेकों
मार्ग भले ही भिन्न सभी के
सत्य एक है इतना जाने ।।2।।
श्रद्धा मेरी दैवत सारे (2)
कोई करे कैसे ही पूजा
कोई करे कैसे ही वंदन
ईश्वर सबके भाव देखते
ईश्वर मन की वाणी सुनते ।।3।।
श्रद्धा मेरी दैवत सारे (2)
वनवासी का धर्म नहीं है
इससे बढ़कर जूठ नहीं है
विदेशियों के षड्यंत्रों को
समझे और सबको समझाये ।।4।।
श्रद्धा मेरी दैवत सारे (2)

 


चरैवेति चरैवेति यही तो मंत्र है अपना

 

 

चरैवेति चरैवेति यहि तो मंत्र है अपना
नहीं रूकना, नहीं थकना, सतत चलना सतत चलना
यही तो मंत्र है अपना शुभंकर मंत्र है अपना।।धृ.।।

हमारी प्रेरणा भास्कर है जिनका रथ सतत चलता
युगों से कार्यरत है जो सनातन है प्रबल ऊर्जा
गति मेरा धरम है जो भ्रमण करना भ्रमण करना ।। 1।।

यही तो मंत्र है अपना शुभंकर मंत्र है अपना…
हमारी प्रेरणा माधव है जिनके मार्ग पर चलना
सभी हिन्दु सहोदर है ये जन-जन को सभी कहना
स्मरण उनका करेंगे हम समय दे अधिक जीवन का।।2।।

यही तो मंत्र है अपना शुभंकर मंत्र है अपना…
हमारी प्रेरणा भारत है भूमि की करे पूजा
सुजल सुफला सदा स्नेहा यही तो रूप है उनका
जिये माता के कारण हम करे जीवन सफल अपना।।3।।
यही तो मंत्र है अपना शुभंकर मंत्र है अपना…

 


 

दूर दूर गॉंवों में जाएे वनबन्धु को मिलाने

 

दूर दूर गाँवों में जाएं वनबन्धु को मिलने
स्वस्थ निरामय जीवन सबका भाव रहा है मन में ।। धृ.।।

घर घर पहुंचे सबको पूछे पिड़ा दुःख है कोई
स्नेहपूर्ण व्यवहार हमारा ऊंच नीच ना कोई
अपनेपन का भाव जगाने गिरी कंदर वन चलतें।। 1।।

उपचारों से स्वस्थ शरीर हो ये हमने देखा है
औषधी देकर धर्म बदलता ये कैसे होता है ?
वनवासी जीवन को समझे समरस हो हम सबसे।। 2।।

मैं करता हूँ मैं करता हूँ उचित भाव ये है क्या?
मिलकर सब हम कार्य करेंगे कर्मरूप में पूजा
समाजरूपी ईश्वर के हम साघक बन कर चलते।। 3।।


जग उठा वनवासी अब तो, जग उठा वनवासी

जाग उठा वनवासी अब तो जाग उठा वनवासी ।। धृ.।।

सूर्योदय हो जनजागृति का
प्रकाश फैला स्वाभिमान का
दूर निशा का अंधकार हो (2)
जागे भारतवासी …………..।। 1।।
अब तो जाग उठा वनवासी

विकास का आधार धर्म है
जोड सके वह सूत्र धर्म है
आज संगठन मंत्र धर्म है (2)
कहते है अविनाशी ।। 2।।
अब तो जाग उठा वनवासी

विधर्मी बैठा जाल बिछाए
भोलेपन का लाभ उठाए
सजग रहे गिरी वन के बन्धु (2)
कहते अपने साथी ……….।। 3।।
अब तो जाग उठा वनवासी

 


वनवासी का संगठन कर ध्येय मार्ग पर चलते

 

वनवासी का संगठन कर ध्येयमार्ग पर चलते
भरतभूमी के साधक है हम कार्य साधना करते
हम सब शक्ति अर्चना करते ।। धृ.।।

सर्वांगीण विकसित वनवासी लक्ष्य रखा है हमने
प्रकल्प उपक्रम कार्यक्रम ये साध्य नहीं साधन है
सही दिशा में समूह गति से आगे अब बढ़ना है।। 1।।
भरतभूमी के साधक है हम कार्य साधना करते

पूर्वांचल है, बस्तर है या रेवा तट के वन है
धैर्य परिक्षा उनकी होती जो इस पथ चलते है
सत्य आग्रही अनथक यात्री कार्यप्रवर रहना है।। 2।।
भरतभूमी के साधक है हम कार्य साधना करते

भीष्म प्रतिज्ञा भीम पराक्रम हम धृव सम है अविचल
कार्यशरण हनुमान सरीखे भक्त बने शबरी सम
हम गुणग्राहक हम परिव्राजक कार्य हमें करना है।। 3।।
भरतभूमी के साधक है हम कार्यसाधना करते

 


वैभवशाली भारत के हम स्वप्न देखती महिलाएं

वैभवशाली भारत के हम स्वप्न देखती महिलाएँ
वन अँचल के घर-घर पहुँचे, अनथक चलती महिलाएँ ।। धृ.।।

शक्तिस्वरूपा, स्नहेसुधा तु, सृजनशील ममतामूर्ति
संस्कारों को करे प्रवाहित जन जन के आधार बनी
अहर्निषम्, कृतिशील रही है, भारतीय ये महिलाएँ ।। 1।।
अनथक चलती महिलाएँ

संकट क्षण में अग्रेसर तु, रणक्षेत्रों में साथ चली
शस्त्रधार कर सेना लेकर, संस्कृति रक्षा कवच बनी,
असुरमर्दिनी दुर्गारूपी आर्यावर्त की महिलाएँ ।। 2।।
अनथक चलती महिलाएँ

पश्चिम की आँधी से अपनी, भरत भूमी है संकट में
समाज सारा प्रभाव में है, राष्ट्र चिती भी संकट में
भविष्य उज्वल तेरे कारण, संकल्पित ये महिलाएँ ।। 3।।
अनथक चलती महिलाएँ


धरती माता कितनी अच्छी

धरती माता कितनी अच्छी
सबका जीवन सुखमय करती
धरती माँ की पूजा करते
धान से अपना घर भर देती (2) ।। धृ.।।

खेतों में हमको श्रम करना है
किरपा होगी तब भिगना है
धरती पर जब सोना उगले
हिरवा की पूजा करनी है (2) ।। 1।।

एक ही दाना बोया हमने
देखो कितने दाने पाये
धरती माता सबको देती
ऋण उसका हम भूल न पाएँ (2) ।। 2।।

धर्म को समझे कहना माने
पुरखों का भी कहना माने
धरती की जो पूजा करते
डनको ही हम अपना माने (2) ।। 3।।


आनंद भरें सबके जीवन में , जीवन के दिन चार

आनंद भरे सबके जीवन में, जीवन के दिन चार
सभी नृत्य करें सभी गीत कहें, एक सूर एक ताल ।। धृ.।।

जीवन सारा उत्सव है, छोटीसी है बात
जो ना समझे सारे जन, रोते है दिन रात
अनपढ़ भी जाने जीवन के होते है रंग हज़ार ।। 1।।

हे नृत्य साधना जीवन की, ना केवल रंजन के साधन
हम शब्दब्रह्म के साधक है, करते है गीतों से अर्चन
वनवासी के नृत्य-गीत में संस्कृति हो साकार ।। 2।।

करमा होया या होली में ये गिरी-कंदर के नाचे जन
हम देख रहे है तन गति में, पर स्थिर हो रहे सबके मन
वनवासी है निर्मल मन के इसके ये है प्रमाण ।। 3।।


खेल खिलाडी खेल

खेल खिलाड़ी खेल (2)
हँसकर मिलकर, डटकर, बढ़कर ……..खेल खिलाड़ी खेल………।। धृ.।।
खेल स्वदेशी अपनाएँगे जनमानस तक पहूँचायेंगे
विजय पताका फहरायेंगे, स्वाभिमान का युग लायेंगे
खेलों की दुनिया में होगा …..
खेलों की दुनिया में होगा प्रथम हमारा खेल ।। 1।।
खेल खिलाड़ी खेल (2)
उछले, कुदे, जल में तैरे, बाधाओं के पथ पर दौडे़
योग, कबड्डी खो-खो खेलें, वनजों को ताकत से तोले
धनुष बाण से फिर साधेंगे एकलव्य का मेल ।। 2।।
खेल खिलाड़ी खेल (2)
सक्त भुजा हो, सशक्त कंधे आँधी में भी अविचल गति हो
रग रग में हो प्यार देश का खुली निगाहे अविचल गति हो
तन में बस हो, मन निर्मल हो……..
तन में बस हो, मन निर्मल हो, ज्यों बाती में तेल ।। 3।।
खेल खिलाड़ी खेल (2)
हार हुई तो मत घबराना, विजय मिली तो मत इतराना
वृत्ति खिलाड़ी भूल न जाना आज रूके तो कल बढ़ जाना
विजय पराजय जो भी आये
विजय पराजय जो भी आये, निर्भय हो के खेल ।। 4।।
खेल खिलाड़ी खेल (2)
खेलों में अद्भुत है क्षमता बढती है आपस में ममता
अटूट साहस धीरज समता, संस्कारों से रूप निखरता
इन्हीं गुणों से जीन सखेंगे, जीवन भर के खेल ।। 5।।
खेल खिलाड़ी खेल (2)


शारदे वर दें ! हमें करुणामयी आशिष दे

 

शारदे वर दे ! हमें करूणामयी आशिष दे।
भवबन्ध के मुक्ति मिले माता हमें तू ज्ञान दे ।।धृ.।।

हंसासिनी पद्मासिनी
हे वीणावादिनी शारदे
शुभ्रवस्त्राधारिणी माता
हमें तू स्नेह दे ।। 1।।

ध्येय पथ के हमे है साधक
विनति कर कर जोड़ के
दी जो विद्या ज्ञान गुणनिधि
आज तेरे द्वार पे ।। 2।।