सातत्यपूर्ण जो कार्य करे
निरपेक्ष भाव से कार्य करे
जन जन के हित में होता जो
उसे यज्ञ कार्य कहते है
उसे धर्म कार्य कहते हैं ।। धृ. ।।
हो चंदन सा जीवन अपना
चहूदिश सुगंध फैला देना
हो परहित में क्षण क्षण अपना
जीवन को सार्थक कर देना
जो ज्योतीशिखा सम जिते है
उसे यज्ञ कार्य कहते हैं
उसे धर्म कार्य कहते हैं ।।1।।
आदर्श हमारा वृक्ष बने
जो पत्र, पुष्प, फल देता है
जो स्वयं धूप में रहकर भी
पथिकों को छाया देता है
जो सबकुछ अर्पित करते है
उसे यज्ञ कार्य कहते है
उसे धर्म कार्य कहते है ।।2।।
सब कुछ मेरा केवल मेरा
इस परिधि से बाहर आना
अनुबंध जुड़े सबसे तो फिर
आनंदित हो त्रिभुवन सारा
नि:स्वार्थ भाव के जीवन को
हम यज्ञ कार्य कहते है
हम धर्म कार्य कहते है ।।3।।
