चाहे आंधी कितनी आये

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चाहे आंधी कितनी आये

 

चाहे आंधी कितनी आये
श्रद्धा मेरी अड़िग रहेगी  ।। धृ. ।।

परंपराओं से मैं हिन्दू
संस्कृति का परिचय भी हिन्दू
चाहे कोई कितना कह दे
अलग नहीं हूं अभिन्न हूं मैं (२)  ।। १ ।।

भ्रम फैलाना कूटनीति है
लोभ रूप में जाल फैली है
भय के कारण श्रद्धा टूटे
निशिदिन प्रतिपल सजग रहूं मैं (२)  ।। २ ।।

वन अंचल का कैसा जीवन
धर्म अपेक्षा वैसा जीवन
प्रकृति पूजा स्वयं कहे की
हिन्दू तनमन हिन्दू जीवन (२)  ।। ३ ।।

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